'सूर सूर तुलसी ससी' अपने काव्य के महारथी

Authors

  • डॉ.नरेन्द्रपानेरी Author

DOI:

https://doi.org/10.1366/scnzt244

Abstract

सूर तथा तुलसी दोनो अपने युग केसच्चे तथा महान भक्त, कवि एवं सन्त है। वे दोनो मूलतः तो भक्त थेउनका संबंध उतना ब्राह्म साहित्य से नहीं था जितना अपने आराध्य देव के प्रति अपनी आराधना एवं परम भक्ति में लीन रहने में था। अब भावों के प्रगटरीकरण में कौन कहाँ तक आया है इसका विवेचन हमारे विवेचनकाकेंद्रहोगा!

साम्य:- सूर तथा तुलसी दोनों हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान नक्षत्र है इसीलिए उन्हें खद्योत की उपमा से अलंकृत किया गया है। इनमें से एक ने सूर-सागर की रचना कर भक्ति-पिपासु जनो के लिए भक्ति रसामृत का अक्षयभण्डार प्रदान किया है तो दूसरे ने गहन तथा गम्भीर 'रामचरितमानस' की रचना करके भव-आतप से विह्वल प्राणियों के निर्मल एवं शीतल भक्ति जल से परिपूर्ण सरोवर का निर्माण किया है। जिसका पयपान करने के  बाद अनायास ही भव बन्धन टूट जाते है।

Published

2006-2025

Issue

Section

Articles

How to Cite

’सूर सूर तुलसी ससी’ अपने काव्य के महारथी. (2025). Leadership, Education, Personality: An Interdisciplinary Journal, ISSN: 2524-6178, 17(12), 113-114. https://doi.org/10.1366/scnzt244