भक्तिकाल के विवेचन में ‘प्रतिक्रिया’ और ‘प्रतिरोध’ के मानक

Authors

  • -डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव Author

DOI:

https://doi.org/10.1366/qr9j5677

Abstract

प्रतिक्रिया और प्रतिरोध की दृष्टि से साहित्य के विवेचन के कारण आज हिन्दी आलोचना का स्वरूप बहुत कुछ राजनीतिक हो गया है । मार्क्सवादी आलोचना इस दिशा में कुछ अधिक सक्रिय रही है । इससे हिन्दी आलोचना के प्रशस्त विकास में बाधा उत्पन्न हुई है । सामान्यत: सभी महत्त्वपूर्ण आलोचकों ने भक्ति साहित्य का विवेचन किया है ।भक्ति काव्यधारा या भक्तिकाल के विवेचन के प्रसंग में प्रायः प्रतिक्रिया और प्रतिरोध जैसे मानकों का व्यवहार किया गया है । सामान्यतः सामंतवादी, जनोन्मुखी और इस्लामी--इन तीन परम्पराओं की पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रिया या प्रतिरोध के रूप में भक्तिकाव्य को विवेचित किया गया है । इससे व्याख्या कमजोर और एकांगी हो गयी है । चूँकि भक्ति-आन्दोलन एक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की अभिव्यक्ति थी इसलिए वह एक प्रतिक्रिया के रूप में भी सामने आयी थी । लेकिन प्रतिक्रिया या प्रतिरोध को लेकर बहुत दूर तक जाया नहीं जा सकता । विशेषतौर पर जब मामला कला और साहित्य का हो जब प्रतिक्रिया और प्रतिरोध के प्रतिमान अप्रांसगिक हो जाते हैं । अत: भक्तिकाव्य के विवेचन के प्रसंग में पुनर्विचार आवश्यक है ।

Published

2006-2025

Issue

Section

Articles

How to Cite

भक्तिकाल के विवेचन में ‘प्रतिक्रिया’ और ‘प्रतिरोध’ के मानक. (2024). Leadership, Education, Personality: An Interdisciplinary Journal, ISSN: 2524-6178, 17(1), 27-32. https://doi.org/10.1366/qr9j5677