सर्वागीण विकास और सामाजिक बदलाव के लिए विद्यालयी शिक्षा
DOI:
https://doi.org/10.1366/j8m94173Abstract
वर्ष 2020 में 21वीं सदी के भारत की पहली शिक्षा नीति आ चुकी है। इस नीति ने भारत के सम्मुख उपस्थित विकास के मुद्दों को संबोधित करने का प्रयास किया है। यह नीति शिक्षा के प्रत्येक घटक-कक्षा शिक्षण, पाठ्यचर्या, गवर्नेंस आदि को 21 वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलना चाहती है। इस नीति का ध्येय भारतीय पंरपरा और मूल्यों के अनुरूप 21वीं सदी के भारत को विकसित करना है। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की पूर्ति के लिए भावी पीढ़ी को तैयार करना है। इस नीति में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक संदर्भ में ही नहीं परिकल्पित की गई है, बल्कि इसे ज्ञान-आधारित समतामूलक समाज के रूप में भी परिकल्पित किया गया है। इसका उद्देश्य विश्व स्तर पर भारत की विशिष्ट पहचान को भी निर्मित करना है। यह नीति भारत की आधारशिला रखती है। इस नीति में निहित भारतीयता की अवधारणा केवल साक्षरता का प्रसार नहीं है, बल्कि विचार, कर्म और व्यवहार में भारतीय मूल्यों को पोषित करना है। इस नीति के द्वारा यूरो-केन्द्रित शिक्षा और चिंतन दृष्टि का पूरी तरह से उन्मूलन किया गया है। ऐसा करने पर ही आने वाले समय में हम भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाली शिक्षा-व्यवस्था को विकसित कर पाएँगे। यह नीति भारत की युवा आबादी की आकांक्षा को भी प्रतिबिंबित करती है। इस नीति को हम युवा भारत की शिक्षा नीति भी कह सकते हैं। इस नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता समग्रता पर बल देना है। यहाँ समग्रता का अभिप्राय व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा-व्यवस्था के समस्त पक्षों का रूपांतरण करना है। इसमें विषय-वस्तु, शिक्षा की संरचना, गवर्नेंस और शिक्षा में मूल्यों के समावेश पर बल देना सम्मिलित है। यह नीति भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव कर अपेक्षा ाऔर वास्तविकता के बीच अंतराल को समाप्त करना चाहती है। इस अंतराल के कारण ही शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और समावेशन की समस्या पैदा हो रही है। उदाहरण के लिए, आज भी हमारी विद्यालय शिक्षा विद्यार्थियों में आधारभूत साक्षरता और वैज्ञानिक चिंतन की क्षमता पैदा नहीं कर पा रही है। आज भी हमारे यहाँ सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रीय, भाषायी स्तर पर समावेशन की चुनौतियाँ उपस्थित हैं। यह नीति इन सभी आयामों को संबोधित करने का पूर्ण प्रयास करती हैं। यह नीति उक्त क्षेत्रों मंे प्राथमिकता के आधार पर अपेक्षित सुधार करने का दायित्व राज्य को सौंपती है। राज्यों से अपेक्षित है कि वे औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था इस तरह से करें कि प्रत्येक व्यक्ति में निहित क्षमता का पूर्ण विकास हो सके और वह आत्मनिर्भर बन सके। व्यक्तियों का आत्मनिर्भर होना ही राष्ट्र की आत्मनिर्भरता का आधार बनेगा, यहाँ आत्म निर्भरता का आशय केवल समर्थवान को समर्थ बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे समूहों को, जो ऐतिहासिक दृष्टि से हाशिए पर है, वंचित हैं, शोषित हैं, शिक्षा द्वारा उनको सशक्त बनाना है। इसे ध्यान में रखते हुए ही शिक्षा नीति में विशिष्ट शिक्षा क्षेत्रों का सुझाव आया है। विशिष्ट शिक्षा क्षेत्र, शिक्षा में समावेशन और समानता की चुनौतियों को संबोधित करने का कार्य करेंगे।



