महिला मुक्ति और सशक्तिकरण में ज्योतिबा फुले का योगदान
DOI:
https://doi.org/10.1366/820ycy22Abstract
आज बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ का नारा दिया जा रहा है। एक ऐसा भी समय था जब लड़कियों की शिक्षा पर बात करना ठीक नहीं समझा जाता था। उन्हें समाज में दुश्मन की तरह देखा जाता था। नारी शिक्षा उस काल में समाज की दृष्टि से एक निराशाजनक युग ही कहा जा सकता है। स्त्रियां चाहे किसी भी वर्ग या जाति की क्यों ना हो, उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं था। तब बाल विवाह जोरों पर था। खेलने खाने की उम्र में ही नन्ही मुन्नी बच्चियों को सास ननद और जेठानी के ताने सुनने पड़ते थे। स्त्रियों को केवल मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए ही घर से निकलने की इजाजत थी। वह किसी मसले पर अपनी राय तक नहीं दे सकती थी। यानी उनके विचारों की अभिव्यक्ति पर पूरी तरह से पाबंदी थी। कड़ा पहरा था. बड़े घरानों की बहू बेटियों पर पाबंदी बहुत ज्यादा थीं। उन्हें केवल यही नसीहत दी जाती थी कि वह घरों में ही रहें। अपना पूरा जीवन परिजनों की सेवा में ही लगायें। बाल बच्चे पैदा करें. उनका लालन पोषण करें। रसोई का काम करने में अपने को धन्य समझें। जब भारत पर अंग्रेजों का अधिकार हो चुका था। देश में अंग्रेजी राज के साथ-साथ ईसाई मिशनरियों का भी प्रादुर्भाव हुआ। उनको यदा-कदा पुजारियों के विरोध का सामना भी करना पड़ता था। कहते हैं कि जब मानवता की पीड़ा हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तब पृथ्वी की कोख से जलते हुए लावा के समान किसी ना किसी महापुरुष का जन्म होता है। वह अपने समय की परंपराओं और रूढ़ियों से लड़ता हुआ मानवता का उद्धार करता है। गुलामी की बेड़ियों को तोड़ता है। सामाजिक समरसता का निर्माण करता है। ऐसे माहौल में ज्योतिबा का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के खानवाड़ी नामक गांव में 11 अप्रैल 1927 को हुआ। माली जाति के होने के कारण पीढ़ियों से इनका पेशा फूल उगाने का था। बाद में इन्हें फूले कहा जाने लगा. ज्योतिबा जब 9 महीने के थे, उसी समय उनकी माता चिमनाबाई का निधन हो गया। उसका लालन पालन मौसेरी बहन सगुनाबाई ने की।



