शास्त्रीय संगीत में तानपूरे की प्रासंगिकता
DOI:
https://doi.org/10.1366/rq50zj75Abstract
शास्त्रीय संगीत गायन, वादन तथा नृत्य तीनों कलाओं में तानपुरा वाद्य से एक आधार स्वर देने की परम्परा काफी समय से चली आ रही है। शास्त्रीय गायन में तानपुरा के बिना गायन अधूरा सा महसूस होता है। तानपुरा कोई सरगम या गीत नहीं वादन करता, बल्कि इसके तारों को झंकृत करके संगीतकार अपने राग की आधारभूमि के रूप में प्रयोग करता है। तानपुरा वाद्य वर्तमान समय में प्रत्येक शास्त्रीय गायन शैली के साथ आधार स्वर के लिए प्रयुक्त किया जाता है। शास्त्रीय गायन में आधार स्वर का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। आधार स्वर की पूर्ति हेतु मुख्य गायक के साथ तानपुरा वादक तानपुरा छेड़़ते हैं, जिससे सारा वातावरण स्वरमय बन जाता है। तानपुरे की स्वर संगति गायक को राग में अधिक से अधिक स्वर विस्तार करने में सहायक सिद्ध होता है। तानपुरा शास्त्रीय गायन की दृष्टिकोण से अभ्यास तथा प्रदर्शन दोनों में ही इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।



