मुगल सम्राट शाहजहाँँ समकालीन खानपान का एक अध्ययन

Authors

  • सरिता कुमारी  Author

DOI:

https://doi.org/10.1366/rqmzww98

Abstract

मनुष्य ज्यों-ज्यों सभ्य और सुसंस्कृत होता जाता है त्यों-त्यों उसके आचार भी शिष्ट होते जाते हैं। इसीलिए सभ्य समाज में परम्परागत आचरण सम्बन्धी आदेशों को शिष्टाचार कहा जाता है, बातचीत करना, उठना, बैठना, खाना, पीना, बस्त्र आदि पहनना, स्वागत सत्यकार करना, स्नेह प्रकट करना आदि समाज में सभ्य एवं सुसंस्कृत होने के कारण माने जाते हैं। शिष्टाचार शील और सौजन्य का क्रियात्मक रूप माना जाता है। इसे हम सुसंस्कृत समाज की कसौटी कह सकते है। मनुष्य के शील और उसके व्यवहार से ही उसके कुल और शील की परख की जाती है और उसके व्यक्तित्व का स्थायी रूप से प्रभावी उसके सम्पर्क में आने वाले लोगो के हृदय पर अंकित हो जाता है। पाश्चात्य विद्वानों ने भी शिष्टाचार को संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग माना है। अमीर तथा सूवेदार लोग अपने दरबार में या दीवाने खाने में मेहमानों का स्वांगत करते थे। उनके यहाँ आने वाले लोग अपनी अपनी श्रेणी के अनुसार ही स्थान ग्रहण करते थे। नये आगन्तुकों को आने के पहले इजाजत लेनी पड़ती थी और काम हो जाने पर उन्हें लौट जाना पड़ता था। केवल मित्र लोग ही देर तक बैठ सकते थे। हिन्दू धर्म में अतिथि को साक्षात नारायण का स्वरूप माना है। अतिथि चाहे जिस भी वर्ग का हो, वह आराध्य माना जाता है और आराध्य रूप में ही उसकी सेवा करनी चाहिए जिस घर में अतिथि का स्वागत नहीं किया जाता वह सर्प के आवास की भांति त्याज्य एवं घृणित होता है। इस प्रकार भारतीय समाज में अतिथि सत्कार को ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।राजदूतों का स्वागत करने के लिए अमीरो को भेजा जाता था और वह बादशाह की तरफ से खिलअत प्रदान करता था। 

Published

2006-2025

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Articles

How to Cite

मुगल सम्राट शाहजहाँँ समकालीन खानपान का एक अध्ययन. (2025). Leadership, Education, Personality: An Interdisciplinary Journal, ISSN: 2524-6178, 19(1), 1103-1108. https://doi.org/10.1366/rqmzww98