प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत् विद्यार्थियों में अपव्यय एवं अवरोधन के कारणों का अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.1366/902hz253Abstract
शिक्षा ही एक मात्र ऐसा माध्यम है जिससे देश का विकास संभव है।शिक्षा के द्वारा ही मानव की आंतरिक शक्तियों का विकास होता हैं और ज्ञान के द्वारा मनुष्य के अन्तर्चक्षु खुल जाते हैं। बालक की प्रारंभिक शिक्षा उसके परिवार से शुरू होती है और उसके बाद विद्यालय में दी जाती है। वर्तमान में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा का विस्तार ईसाई मिशनरियों एवं ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था। 26 जनवरी 1950 में भारत के संविधान को लागू किया गया। संविधान की 45 वी धारा में प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने की बात कही गई। 1990-91 के आंकड़ों के आधार पर शिक्षा में विद्यार्थियों के नामांकन का प्रतिशत अच्छा नहीं रहा था जिसके अंतर्गत छात्र-छात्राओं में विद्यालय छोड़ने का प्रतिशत अधिक देखा गया।1929 में हर्टाग समिति ने अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या में सुधार किया। हर्टाग समिति ने अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के विभिन्न कारण बताए थे जिनमें सामाजिक-आर्थिक कारण, विद्यार्थीयों में शिक्षा के प्रति रुचि का अभाव, विद्यालयों में संसाधनों की कमी, माता-पिता का शिक्षा के प्रति उदासीनता, लड़कियों की कम उम्र में शादी आदि,को शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन के प्रमुख कारण बताएं थे। 2017-18 में एनएसएसओ के 75 वे राउंड के हाउसहोल्ड सर्वे में विद्यालय में ना जाने वाले छात्र-छात्रों की संख्या 3.22 करोड़ बताई हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, ने ड्रॉप आउट को परिभाषित किया हैं। प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में सकल नामांकन 100 % को 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य रखा। यूडीआईएसई-2021-22 के आंकड़ों के आधार पर प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में अपव्यय व अवरोधन की समस्या के कारण देखे गए, जिसमें माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों में ड्रॉपआउट की दर अधिक पाई गई। इन आंकड़ों के आधार पर कह सकते हैं कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में ड्रॉप आउट की संख्या आज भी अधिक हैं, इसके विभिन्न कारण देखे गए हैं। इसके लिए शिक्षा में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता है।



