वैदिक कालीन ’साम’ संगीत: एक अवलोकन
DOI:
https://doi.org/10.1366/kh6apd48Abstract
भारतीय संगीत विश्व का प्राचीनतम संगीत माना गया है। इसकी ऐतिहासिकता उतनी ही प्राचीन है, जितना मानव जाति के जीवन का इतिहास। संागीतिक इतिहास को आधार प्रदान करने के लिये सिन्धु घाटी की सभ्यता मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों की सहायता ली जाती है। प्राचीनकाल में भी वैदिक काल से पूर्व हमें संगीत के अस्तित्व का कोई लिखित प्रमाण प्राप्त नहीं होता है, परन्तु यह अवश्य है कि मोहनजोदडों तथा हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों में अंकित वाद्य एवं नृत्य की प्रतिमा संगीत के अस्तित्व का आभास कराती है। मोहनजोदड़ों तथा हड़प्पा की खुदाई से नृत्य मुद्राओं में प्राप्त मूतियों से ज्ञात होता है, कि उस काल में अन्य कलाओं के साथ-साथ नृत्य कला भी अपने चरमोत्कर्ष पर थी। जैसा कि सर्वविदित है कि नृत्य कभी भी वाद्य व गान के बिना पूर्ण नही हो सकता, अतः इस तथ्य से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि, प्राग्वैदिक युग में भी संगीत का पूर्ण रूप से प्रचार व प्रसार था परन्तु यह किस रूप में था इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं प्राप्त होता है। इसके पश्चात् सर्वप्रथम संगीत का इतिहास लिखित रूप से हमें वैदिक काल के सामवेद से प्राप्त होता है। वैदिक काल के चारों वेदो में केवल सामवेद में ही संगीत की चर्चा प्राप्त होती है। उस काल में सामगान की प्रथा विद्यमान थी तथा यह सामगान तीन स्वरों उदात्त (ऊँचा), अनुदात्त (नीचा) तथा स्वरित (मध्यम) के द्वारा हुआ करता था। बाद में शनैः शनैः शताब्दियों के परिवर्तन के पश्चात् इन्ही तीन स्वरों से सात स्वर विकसित हुये।



