राष्ट्रीय-सांरकृतिक काव्यधाराः एक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.1366/gtnzmw42Abstract
विवेच्य काल भारतीय जीवन के लिए विषम संघर्ष का समय था। देश ऐसे साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसा हुआ था, जिनकी शासन-पद्धति प्राचीन काल के विदेशियों से मुख्यतः भिन्न थी। अंग्रेजों से पहले जितने भी विदेशी आक्रमणकारी यहां आये, वे या तो लूटमार करके वापस चले गये या देश में देश के ही हो कर रह गये। निस्संदेह वे अपने वर्ग या धर्म पर आस्था रखने वालों को अधिक सुविधाएं देते थे और दूसरे धर्मों के लोगों को वैसी समानता का अधिकार नहीं मिल पाता था, फिर भी वे इस देश में रहते हुए किसी दूसरे देश के हित की बात नहीं सोचते थे। इसके विपरीत अंग्रेज शासक यहां रहते हुए भी यहां के निवासी नहीं बने। उनका उद्देश्य था-इस देश का शोषण कर अपने देश की श्रीवृद्धि करना। इसलिए उनके प्रति आक्रोश होना स्वाभाविक ही था। यह आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ता हुआ स्वाधीनता-संग्राम के रूप में फूट पड़ा और महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी का संघर्ष एक नये रूप में- अहिंसा और सत्य पर आधारित असहयोग के रूप में हमारे सामने आया। इस युग के राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य में दो भावनाएं पूरी शक्ति के साथ व्यक्त हुईं एक ओर तो कवियों ने भारत की आंतरिक विसंगतियों और विषमताओं को दूर करने के लिए देश का आह्वान किया, और दूसरी ओर जनता को विदेशी शासन से मुक्ति पाने के लिए स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ने की प्रेरणा दी। माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन‘ और सुभद्राकुमारी चैहान ने केवल राष्ट्रप्रेम को ही मुखरित नहीं किया, अपितु उन्होंने स्वयं देश की आजादी की लड़ाई में भाग भी लिया। फलस्वरूप उनकी देशप्रेम की कविताओं में अनुभूति की सच्चाई और आवेश दिखायी देता है। उदाहरणार्थ, माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कैदी और कोकिला‘ शीर्षक कविता में अपनी अनुभूति को ही एक उच्चतर और लोकसामान्य भावभूमि के स्तर पर व्यक्त करने का प्रयास किया है:



