भारत में उपभोक्ता संरक्षण की व्यवस्था : अधिकार, विधिक ढांचा एवं चुनौतियाँ
DOI:
https://doi.org/10.1366/bmd9d128Abstract
आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में उपभोक्ता को बाजार प्रणाली का केंद्र माना जाता है। उत्पादन, वितरण तथा विनिमय की समस्त गतिविधियाँ अंततः उपभोक्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही संचालित होती हैं। किंतु व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, अधिक लाभ प्राप्त करने की प्रवृत्ति, भ्रामक विज्ञापन, मिलावटी वस्तुओं की बिक्री तथा निम्न गुणवत्ता की सेवाओं के कारण अनेक बार उपभोक्ताओं के हितों का हनन होता है। ऐसी परिस्थितियों में उपभोक्ता संरक्षण की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए विभिन्न विधिक व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं, जिनमें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस अधिनियम ने उपभोक्ताओं को सरल, त्वरित तथा कम खर्च में न्याय प्राप्त करने की व्यवस्था प्रदान की है। प्रस्तुत शोध-पत्र में भारत में उपभोक्ता संरक्षण की अवधारणा, उपभोक्ता अधिकारों, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की विशेषताओं, उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र तथा उपभोक्ता संरक्षण के समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है।



